HL Foundation
Friday, 1 November 2013
Thursday, 11 July 2013
Tuesday, 2 July 2013
बाल गंगाधर तिलकजी के बाल्यकाल की यह घटना हैः
बाल गंगाधर तिलकजी के बाल्यकाल की यह
घटना हैः
एक बार वे घर पर अकेले ही बैठे थे
कि अचानक उन्हें चौपड़ खेलने
की इच्छा हुई। किंतु अकेले चौपड़ कैसे खेलते?
अतः उन्होंने घर के खंभे
को अपना साथी बनाया। वे दायें हाथ से खंभे
के लिए और बायें हाथ से अपने लिए खेलने
लगे। इस प्रकार खेलते-खेलते वे दो बार हार
गये।
दादी माँ दूर से यह सब नजारा देख रही थीं।
हँसते हुए वे बोलीः
"धत् तेरे की... एक खंभे से हार गया?"
तिलकजीः "हार गया तो क्या हुआ?
मेरा दायाँ हाथ खंभे के हवाले था और मुझे
दायें हाथ से खेलने की आदत है। इसीलिए
खंभा जीत गया, नहीं तो मैं जीतता।"
कैसा अदभुत था तिलकजी का न्याय ! जिस
हाथ से अच्छे से खेल सकते थे उससे खंभे के
पक्ष में खेले और हारने पर सहजता से हार
भी स्वीकार कर ली।
महापुरुषों का बाल्यकाल भी नैतिक गुणों से
भरपूर ही हुआ करता है।
इसी प्रकार एक बार छः मासिक परीक्षा में
तिलकजी ने प्रश्नपत्र के सभी प्रश्नों के
सही जवाब लिख डाले।
जब परीक्षाफल घोषित हुआ तब
विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए
भी बाँटे जा रहे थे। जब तिलक
जी की कक्षा की बारी आयी तब पहले नंबर
के लिए तिलकजी का नाम घोषित किया गया।
ज्यों ही अध्यापक तिलकजी को बुलाकर
इनाम देने लगे, त्यों ही बालक तिलकजी रोने
लगे।
यह देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ ! जब
अध्यापक ने तिलकजी से रोने का कारण
पूछा तो वे बोलेः
"अध्यापक जी ! सच बात तो यह है
कि सभी प्रश्नों के जवाब मैंने नहीं लिखे हैं।
आप सारे प्रश्नों के सही जवाब लिखने के
लिए मुझे इनाम दे रहे हैं, किंतु एक प्रश्न
का जवाब मैंने अपने मित्र से पूछकर
लिखा था। अतः इनाम का वास्तविक हकदार
मैं नहीं हूँ।"
अध्यापक प्रसन्न होकर तिलकजी को गले
लगाकर बोलेः
"बेटा ! भले तुम्हारा पहले नंबर के लिए
इनाम पाने का हक नहीं बनता, किंतु यह
इनाम अब तुम्हें सच्चाई के लिए देता हूँ।"
ऐसे सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय और ईमानदार
बालक ही आगे चलकर महान कार्य कर पाते
हैं।
प्यारे विद्यार्थियो ! तुम ही भावी भारत के
भाग्य विधाता हो। अतः अभी से अपने जीवन
में सत्यपालन, ईमानदारी, संयम, सदाचार,
न्यायप्रियता आदि गुणों को अपना कर
अपना जीवन महान बनाओ। तुम्हीं में से
कोई लोकमान्य तिलक तो कोई सरदार
वल्लभभाई पटेल, कोई शिवाजी तो कोई
महाराणा प्रताप जैसा बन सकता है।
तुम्हीं में से कोई ध्रुव, प्रह्लाद, मीरा,
मदालसा का आदर्श पुनः स्थापित कर
सकता है।
उठो, जागो और अपने इतिहास-प्रसिद्ध
महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने
जीवन को भी दिव्य बनाने के मार्ग पर
अग्रसर हो जाओ.... भगवत्कृपा और संत-
महापुरुषों के आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं। —बाल गंगाधर तिलकजी के बाल्यकाल की यह
घटना हैः
एक बार वे घर पर अकेले ही बैठे थे
कि अचानक उन्हें चौपड़ खेलने
की इच्छा हुई। किंतु अकेले चौपड़ कैसे खेलते?
अतः उन्होंने घर के खंभे
को अपना साथी बनाया। वे दायें हाथ से खंभे
के लिए और बायें हाथ से अपने लिए खेलने
लगे। इस प्रकार खेलते-खेलते वे दो बार हार
गये।
दादी माँ दूर से यह सब नजारा देख रही थीं।
हँसते हुए वे बोलीः
"धत् तेरे की... एक खंभे से हार गया?"
तिलकजीः "हार गया तो क्या हुआ?
मेरा दायाँ हाथ खंभे के हवाले था और मुझे
दायें हाथ से खेलने की आदत है। इसीलिए
खंभा जीत गया, नहीं तो मैं जीतता।"
कैसा अदभुत था तिलकजी का न्याय ! जिस
हाथ से अच्छे से खेल सकते थे उससे खंभे के
पक्ष में खेले और हारने पर सहजता से हार
भी स्वीकार कर ली।
महापुरुषों का बाल्यकाल भी नैतिक गुणों से
भरपूर ही हुआ करता है।
इसी प्रकार एक बार छः मासिक परीक्षा में
तिलकजी ने प्रश्नपत्र के सभी प्रश्नों के
सही जवाब लिख डाले।
जब परीक्षाफल घोषित हुआ तब
विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए
भी बाँटे जा रहे थे। जब तिलक
जी की कक्षा की बारी आयी तब पहले नंबर
के लिए तिलकजी का नाम घोषित किया गया।
ज्यों ही अध्यापक तिलकजी को बुलाकर
इनाम देने लगे, त्यों ही बालक तिलकजी रोने
लगे।
यह देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ ! जब
अध्यापक ने तिलकजी से रोने का कारण
पूछा तो वे बोलेः
"अध्यापक जी ! सच बात तो यह है
कि सभी प्रश्नों के जवाब मैंने नहीं लिखे हैं।
आप सारे प्रश्नों के सही जवाब लिखने के
लिए मुझे इनाम दे रहे हैं, किंतु एक प्रश्न
का जवाब मैंने अपने मित्र से पूछकर
लिखा था। अतः इनाम का वास्तविक हकदार
मैं नहीं हूँ।"
अध्यापक प्रसन्न होकर तिलकजी को गले
लगाकर बोलेः
"बेटा ! भले तुम्हारा पहले नंबर के लिए
इनाम पाने का हक नहीं बनता, किंतु यह
इनाम अब तुम्हें सच्चाई के लिए देता हूँ।"
ऐसे सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय और ईमानदार
बालक ही आगे चलकर महान कार्य कर पाते
हैं।
प्यारे विद्यार्थियो ! तुम ही भावी भारत के
भाग्य विधाता हो। अतः अभी से अपने जीवन
में सत्यपालन, ईमानदारी, संयम, सदाचार,
न्यायप्रियता आदि गुणों को अपना कर
अपना जीवन महान बनाओ। तुम्हीं में से
कोई लोकमान्य तिलक तो कोई सरदार
वल्लभभाई पटेल, कोई शिवाजी तो कोई
महाराणा प्रताप जैसा बन सकता है।
तुम्हीं में से कोई ध्रुव, प्रह्लाद, मीरा,
मदालसा का आदर्श पुनः स्थापित कर
सकता है।
उठो, जागो और अपने इतिहास-प्रसिद्ध
महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने
जीवन को भी दिव्य बनाने के मार्ग पर
अग्रसर हो जाओ.... भगवत्कृपा और संत-
महापुरुषों के आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं। —
घटना हैः
एक बार वे घर पर अकेले ही बैठे थे
कि अचानक उन्हें चौपड़ खेलने
की इच्छा हुई। किंतु अकेले चौपड़ कैसे खेलते?
अतः उन्होंने घर के खंभे
को अपना साथी बनाया। वे दायें हाथ से खंभे
के लिए और बायें हाथ से अपने लिए खेलने
लगे। इस प्रकार खेलते-खेलते वे दो बार हार
गये।
दादी माँ दूर से यह सब नजारा देख रही थीं।
हँसते हुए वे बोलीः
"धत् तेरे की... एक खंभे से हार गया?"
तिलकजीः "हार गया तो क्या हुआ?
मेरा दायाँ हाथ खंभे के हवाले था और मुझे
दायें हाथ से खेलने की आदत है। इसीलिए
खंभा जीत गया, नहीं तो मैं जीतता।"
कैसा अदभुत था तिलकजी का न्याय ! जिस
हाथ से अच्छे से खेल सकते थे उससे खंभे के
पक्ष में खेले और हारने पर सहजता से हार
भी स्वीकार कर ली।
महापुरुषों का बाल्यकाल भी नैतिक गुणों से
भरपूर ही हुआ करता है।
इसी प्रकार एक बार छः मासिक परीक्षा में
तिलकजी ने प्रश्नपत्र के सभी प्रश्नों के
सही जवाब लिख डाले।
जब परीक्षाफल घोषित हुआ तब
विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए
भी बाँटे जा रहे थे। जब तिलक
जी की कक्षा की बारी आयी तब पहले नंबर
के लिए तिलकजी का नाम घोषित किया गया।
ज्यों ही अध्यापक तिलकजी को बुलाकर
इनाम देने लगे, त्यों ही बालक तिलकजी रोने
लगे।
यह देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ ! जब
अध्यापक ने तिलकजी से रोने का कारण
पूछा तो वे बोलेः
"अध्यापक जी ! सच बात तो यह है
कि सभी प्रश्नों के जवाब मैंने नहीं लिखे हैं।
आप सारे प्रश्नों के सही जवाब लिखने के
लिए मुझे इनाम दे रहे हैं, किंतु एक प्रश्न
का जवाब मैंने अपने मित्र से पूछकर
लिखा था। अतः इनाम का वास्तविक हकदार
मैं नहीं हूँ।"
अध्यापक प्रसन्न होकर तिलकजी को गले
लगाकर बोलेः
"बेटा ! भले तुम्हारा पहले नंबर के लिए
इनाम पाने का हक नहीं बनता, किंतु यह
इनाम अब तुम्हें सच्चाई के लिए देता हूँ।"
ऐसे सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय और ईमानदार
बालक ही आगे चलकर महान कार्य कर पाते
हैं।
प्यारे विद्यार्थियो ! तुम ही भावी भारत के
भाग्य विधाता हो। अतः अभी से अपने जीवन
में सत्यपालन, ईमानदारी, संयम, सदाचार,
न्यायप्रियता आदि गुणों को अपना कर
अपना जीवन महान बनाओ। तुम्हीं में से
कोई लोकमान्य तिलक तो कोई सरदार
वल्लभभाई पटेल, कोई शिवाजी तो कोई
महाराणा प्रताप जैसा बन सकता है।
तुम्हीं में से कोई ध्रुव, प्रह्लाद, मीरा,
मदालसा का आदर्श पुनः स्थापित कर
सकता है।
उठो, जागो और अपने इतिहास-प्रसिद्ध
महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने
जीवन को भी दिव्य बनाने के मार्ग पर
अग्रसर हो जाओ.... भगवत्कृपा और संत-
महापुरुषों के आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं। —बाल गंगाधर तिलकजी के बाल्यकाल की यह
घटना हैः
एक बार वे घर पर अकेले ही बैठे थे
कि अचानक उन्हें चौपड़ खेलने
की इच्छा हुई। किंतु अकेले चौपड़ कैसे खेलते?
अतः उन्होंने घर के खंभे
को अपना साथी बनाया। वे दायें हाथ से खंभे
के लिए और बायें हाथ से अपने लिए खेलने
लगे। इस प्रकार खेलते-खेलते वे दो बार हार
गये।
दादी माँ दूर से यह सब नजारा देख रही थीं।
हँसते हुए वे बोलीः
"धत् तेरे की... एक खंभे से हार गया?"
तिलकजीः "हार गया तो क्या हुआ?
मेरा दायाँ हाथ खंभे के हवाले था और मुझे
दायें हाथ से खेलने की आदत है। इसीलिए
खंभा जीत गया, नहीं तो मैं जीतता।"
कैसा अदभुत था तिलकजी का न्याय ! जिस
हाथ से अच्छे से खेल सकते थे उससे खंभे के
पक्ष में खेले और हारने पर सहजता से हार
भी स्वीकार कर ली।
महापुरुषों का बाल्यकाल भी नैतिक गुणों से
भरपूर ही हुआ करता है।
इसी प्रकार एक बार छः मासिक परीक्षा में
तिलकजी ने प्रश्नपत्र के सभी प्रश्नों के
सही जवाब लिख डाले।
जब परीक्षाफल घोषित हुआ तब
विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए
भी बाँटे जा रहे थे। जब तिलक
जी की कक्षा की बारी आयी तब पहले नंबर
के लिए तिलकजी का नाम घोषित किया गया।
ज्यों ही अध्यापक तिलकजी को बुलाकर
इनाम देने लगे, त्यों ही बालक तिलकजी रोने
लगे।
यह देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ ! जब
अध्यापक ने तिलकजी से रोने का कारण
पूछा तो वे बोलेः
"अध्यापक जी ! सच बात तो यह है
कि सभी प्रश्नों के जवाब मैंने नहीं लिखे हैं।
आप सारे प्रश्नों के सही जवाब लिखने के
लिए मुझे इनाम दे रहे हैं, किंतु एक प्रश्न
का जवाब मैंने अपने मित्र से पूछकर
लिखा था। अतः इनाम का वास्तविक हकदार
मैं नहीं हूँ।"
अध्यापक प्रसन्न होकर तिलकजी को गले
लगाकर बोलेः
"बेटा ! भले तुम्हारा पहले नंबर के लिए
इनाम पाने का हक नहीं बनता, किंतु यह
इनाम अब तुम्हें सच्चाई के लिए देता हूँ।"
ऐसे सत्यनिष्ठ, न्यायप्रिय और ईमानदार
बालक ही आगे चलकर महान कार्य कर पाते
हैं।
प्यारे विद्यार्थियो ! तुम ही भावी भारत के
भाग्य विधाता हो। अतः अभी से अपने जीवन
में सत्यपालन, ईमानदारी, संयम, सदाचार,
न्यायप्रियता आदि गुणों को अपना कर
अपना जीवन महान बनाओ। तुम्हीं में से
कोई लोकमान्य तिलक तो कोई सरदार
वल्लभभाई पटेल, कोई शिवाजी तो कोई
महाराणा प्रताप जैसा बन सकता है।
तुम्हीं में से कोई ध्रुव, प्रह्लाद, मीरा,
मदालसा का आदर्श पुनः स्थापित कर
सकता है।
उठो, जागो और अपने इतिहास-प्रसिद्ध
महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने
जीवन को भी दिव्य बनाने के मार्ग पर
अग्रसर हो जाओ.... भगवत्कृपा और संत-
महापुरुषों के आशीर्वाद तुम्हारे साथ हैं। —

भगत सिंह के जीवन से जुडी कुछ महत्वपूर्ण बातें -
भगत सिंह के जीवन से जुडी कुछ महत्वपूर्ण
बातें -
१. भगतसिंह ने एक राष्ट्रवादी और
देशभक्त परिवार में जन्म लिया था !!
भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह एक लेखक
तथा एक देशभक्त नागरिक थे !! उनके
पिता भी एक बहुत बडे देशभक्त थे !!
उनका भगतसिंह के जीवन पर असर पड़ा !!
उनके बारे में प्रसिद्ध है
कि वो किताबों को पढते
नहीं बल्कि निगलते थे !!
२. भगत सिंह ने ५ साल से लेकर साढ़े 23
साल की उम्र तक (लगभग 18 वर्ष तक)
पूरी तरह से सजग और चैतन्य इंसान
की तरह जिया !!
३. भगत सिंह के लिए देश का मतलब देश
की मिट्टी से, इसके शहर-गाँव से नहीं था,
बल्कि देश की जनता से था !! इसीलिए
भगत सिंह मानते थे कि देश पर चाहे
कालों का राज रहे या गोरों का, जब तक
यह व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक भारत
की हालत में सुधार नहीं होगा !! भगत
सिंह पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनमें
सबसे पहले सामाजिक चेतना जागी थी !!
इनसे पहले के क्रांतिकारी 'भारत
माता की जय' तक सीमित थी !!
४. गाँधी का रास्ता अंग्रेजों को बहुत
अच्छा लगता था,
क्योंकि गाँधी अंग्रेजों के शोषण को खत्म
करने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रहे
थे !! अंग्रेज़ों को मालूम था कि यदि भगत
सिंह ज़िंदा रहे, या भगत सिंह का विचार
ज़िंदा रहा तो यहाँ की जनता हमसे
शोषण का हिसाब माँगेंगी !! इसीलिए
अंग्रेजों ने भारत को विभाजन
का रास्ता का दिखाया जिसका फायदा
मेरा मानना है कि विभाजन
का जिम्मेदार अकेले
जिन्ना नहीं बल्कि उसके साथ-साथ
ब्रिटिश सरकार और गाँधी-नेहरु जैसे लोग
भी थे !! गाँधी इसलिए क्योंकि इन्होंने
उस समय कुछ नहीं बोला जब उन्हें
बोलना चाहिए था !! गाँधी यदि पटेल-
नेहरू की सत्तालोलुपता को समझकर
विभाजन को रोक लेते तो आज देश
की दशा कुछ और ही होती !!
५. भगत सिंह ने एक महान काम यह
भी किया कि सबकुछ अपनी डायरी में
लिखकर रखा !! जिससे आज भगत सिंह के
वास्तविक दस्तावेज और असलियत हमारे
सामने है !! भगत ने फाँसी से मरने से पहले
भी लिखा कि मेरे मरने के बाद
क्या करना है !! भगत सिंह पहले ऐसे
क्रांतिकारी थे, जो कहते थे कि देश
को आज़ाद होने के लिए
मेरा मरना ज़रूरी है !! भगत सिंह ने
अपनी फाँसी खुद चुनी थी !! यहाँ पर
भी मेरा मानना है कि अगर गाँधी चाहते
तो उन्हें बचा सकते थे मगर वो अपने
ढोंगी अहिंसा नीति के दंभ में चूर थे !!
६. भगत सिंह 'बम-बारूद' के खिलाफ थे !! वे
कहते थे कि यदि पुलिस जनता पर प्रहार
नहीं करेगी, तो जनता पर भी उन पर
पत्थर नहीं फेंकेगी, पुलिस-स्टेशन को बम से
नहीं उड़ायेगी !! हिंसा की शुरूआत
हमेशा पुलिस/स्टेट/ब्रिटिश करती थी !!
७. आज तक पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम
उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक
विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश
किसी ने नहीं की !!
८. हिन्दुस्तान में सबसे अधिक किताबें
भगत सिंह पर लिखी गई हैं !! भारत
की लगभग ��र ���ाषा में भगत सिंह
के ऊपर किताबें हैं !!
९. भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर
नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के
सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे !!
इसी कारण से उन्हें
पूँजीपतियों तथा अंग्रेजों की मजदूरों के
प्रति शोषण की नीति पसन्द
नहीं आती थी !! भगत सिंह चाहते थे
कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये
कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय
में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है मगर
उसमें कोई खून-खराबा ना हो !! ८ अप्रैल,
१९२९ को उन्होंने बटुकेश्वर नाथ के साथ
मिल कर केन्द्रीय असेम्बली में एक ऐसे
स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न
था !! बम फेंकने के बाद भगत सिंह चाहते
तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले
ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार
है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो !! बम
फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब
जिन्दाबाद !! साम्राज्यवाद
मुर्दाबाद !!" का नारा लगाया और अपने
साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये !!
इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और
दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया !!
१०. जेल के अंदर जब कैदियों को ठीक
भोजन नहीं मिलता था और सुविधाएं
जो मिलनी चाहिए थीं, नहीं मिलती थीं,
तो भगतसिंह ने आमरण अनशन किया !!
भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४
दिनों तक भूख हडताल की !! उनके एक
साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख
हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे !!
अंततः अंग्रेजों को झुकना पडा !!
११. भगतसिंह को गांधी जी का धीरे धीरे
चलने वाला रास्ता पसंद नहीं था !!
लेकिन भगतसिंह हिंसा के रास्ते पर
नहीं थे !! उनके भरी अदालत में जिस बयान
के कारण उनको फांसी की सजा मिली,
उतना बेहतर बयान आज तक हिंदुस्तान के
किसी भी राजनीतिक कैदी ने
नहीं दिया !!
१२. जब भगत सिंह अंतिम बार अपने
परिवार से मिलें थे, उस समय उन्हें यकीन
हो गया था कि ये उनकी अंतिम मुलाकात
है !! उन्होंने अपने मां से कहा, “बेबेजी,
दादाजी अब ज्यादा दिन तक
नहीं जियेंगे !! आप बंगा जाकर इनके पास
ही रहना !!” सबसे उन्होंने अलग-अलग बात
की !! सबको धैर्य बंधाया, सांत्वना दी !!
अंत में मां को पास बुलाकर हंसते-हंसते
मस्ती भरे स्वर में कहा, ‘‘लाश लेने आप मत
आना !! कुलबीर को भेज देना !! कहीं आप
रो पड़ी तो लोग कहेंगे कि भगत सिंह
की मां रो रही है !! इतना कहकर वे इतने
जोर से हंसे कि जेल अधिकारी उन्हें
फटी आंखों से देखते रह गए !!
१३. फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान
पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास
आया तब वो “राम प्रसाद बिस्मिल”
की जीवनी पढ रहे थे(कुछ
लोगों का मानना है कि वो लेनिन
की जीवनी पढ रहे थे) !! उन्होंने
बिना सिर उठाए हुए उससे
कहा 'ठहरो भाई, मैं राम प्रसात
बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहा हूं !! एक
क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल
रहा है !! थोड़ा रुको !!' ऐसा इंसान जिसे
कुछ पलों के बाद फांसी होने वाली है उसके
बावजूद वो किताबें पढ़ रहा है, ये
कल्पना कर पाना भी बेहद मुश्किल है !!
१४. अंततः फांसी के निर्धारित समय से १
दिन पहले २३ मार्च १९३१ को शाम में
करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह
तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु
को फाँसी दे दी गई !! फाँसी पर जाते
समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे !!
मेरा रँग दे बसन्ती चोला !! माय रँग दे
बसन्ती चोला !!

बातें -
१. भगतसिंह ने एक राष्ट्रवादी और
देशभक्त परिवार में जन्म लिया था !!
भगतसिंह के चाचा अजीत सिंह एक लेखक
तथा एक देशभक्त नागरिक थे !! उनके
पिता भी एक बहुत बडे देशभक्त थे !!
उनका भगतसिंह के जीवन पर असर पड़ा !!
उनके बारे में प्रसिद्ध है
कि वो किताबों को पढते
नहीं बल्कि निगलते थे !!
२. भगत सिंह ने ५ साल से लेकर साढ़े 23
साल की उम्र तक (लगभग 18 वर्ष तक)
पूरी तरह से सजग और चैतन्य इंसान
की तरह जिया !!
३. भगत सिंह के लिए देश का मतलब देश
की मिट्टी से, इसके शहर-गाँव से नहीं था,
बल्कि देश की जनता से था !! इसीलिए
भगत सिंह मानते थे कि देश पर चाहे
कालों का राज रहे या गोरों का, जब तक
यह व्यवस्था नहीं बदलेगी तब तक भारत
की हालत में सुधार नहीं होगा !! भगत
सिंह पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनमें
सबसे पहले सामाजिक चेतना जागी थी !!
इनसे पहले के क्रांतिकारी 'भारत
माता की जय' तक सीमित थी !!
४. गाँधी का रास्ता अंग्रेजों को बहुत
अच्छा लगता था,
क्योंकि गाँधी अंग्रेजों के शोषण को खत्म
करने के लिए कोई कोशिश नहीं कर रहे
थे !! अंग्रेज़ों को मालूम था कि यदि भगत
सिंह ज़िंदा रहे, या भगत सिंह का विचार
ज़िंदा रहा तो यहाँ की जनता हमसे
शोषण का हिसाब माँगेंगी !! इसीलिए
अंग्रेजों ने भारत को विभाजन
का रास्ता का दिखाया जिसका फायदा
मेरा मानना है कि विभाजन
का जिम्मेदार अकेले
जिन्ना नहीं बल्कि उसके साथ-साथ
ब्रिटिश सरकार और गाँधी-नेहरु जैसे लोग
भी थे !! गाँधी इसलिए क्योंकि इन्होंने
उस समय कुछ नहीं बोला जब उन्हें
बोलना चाहिए था !! गाँधी यदि पटेल-
नेहरू की सत्तालोलुपता को समझकर
विभाजन को रोक लेते तो आज देश
की दशा कुछ और ही होती !!
५. भगत सिंह ने एक महान काम यह
भी किया कि सबकुछ अपनी डायरी में
लिखकर रखा !! जिससे आज भगत सिंह के
वास्तविक दस्तावेज और असलियत हमारे
सामने है !! भगत ने फाँसी से मरने से पहले
भी लिखा कि मेरे मरने के बाद
क्या करना है !! भगत सिंह पहले ऐसे
क्रांतिकारी थे, जो कहते थे कि देश
को आज़ाद होने के लिए
मेरा मरना ज़रूरी है !! भगत सिंह ने
अपनी फाँसी खुद चुनी थी !! यहाँ पर
भी मेरा मानना है कि अगर गाँधी चाहते
तो उन्हें बचा सकते थे मगर वो अपने
ढोंगी अहिंसा नीति के दंभ में चूर थे !!
६. भगत सिंह 'बम-बारूद' के खिलाफ थे !! वे
कहते थे कि यदि पुलिस जनता पर प्रहार
नहीं करेगी, तो जनता पर भी उन पर
पत्थर नहीं फेंकेगी, पुलिस-स्टेशन को बम से
नहीं उड़ायेगी !! हिंसा की शुरूआत
हमेशा पुलिस/स्टेट/ब्रिटिश करती थी !!
७. आज तक पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम
उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक
विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश
किसी ने नहीं की !!
८. हिन्दुस्तान में सबसे अधिक किताबें
भगत सिंह पर लिखी गई हैं !! भारत
की लगभग ��र ���ाषा में भगत सिंह
के ऊपर किताबें हैं !!
९. भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर
नहीं थे परन्तु वे कार्ल मार्क्स के
सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे !!
इसी कारण से उन्हें
पूँजीपतियों तथा अंग्रेजों की मजदूरों के
प्रति शोषण की नीति पसन्द
नहीं आती थी !! भगत सिंह चाहते थे
कि अँग्रेजों को पता चलना चाहिये
कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय
में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है मगर
उसमें कोई खून-खराबा ना हो !! ८ अप्रैल,
१९२९ को उन्होंने बटुकेश्वर नाथ के साथ
मिल कर केन्द्रीय असेम्बली में एक ऐसे
स्थान पर बम फेंका जहाँ कोई मौजूद न
था !! बम फेंकने के बाद भगत सिंह चाहते
तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले
ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार
है चाहें वह फाँसी ही क्यों न हो !! बम
फटने के बाद उन्होंने "इंकलाब
जिन्दाबाद !! साम्राज्यवाद
मुर्दाबाद !!" का नारा लगाया और अपने
साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये !!
इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और
दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया !!
१०. जेल के अंदर जब कैदियों को ठीक
भोजन नहीं मिलता था और सुविधाएं
जो मिलनी चाहिए थीं, नहीं मिलती थीं,
तो भगतसिंह ने आमरण अनशन किया !!
भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४
दिनों तक भूख हडताल की !! उनके एक
साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख
हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे !!
अंततः अंग्रेजों को झुकना पडा !!
११. भगतसिंह को गांधी जी का धीरे धीरे
चलने वाला रास्ता पसंद नहीं था !!
लेकिन भगतसिंह हिंसा के रास्ते पर
नहीं थे !! उनके भरी अदालत में जिस बयान
के कारण उनको फांसी की सजा मिली,
उतना बेहतर बयान आज तक हिंदुस्तान के
किसी भी राजनीतिक कैदी ने
नहीं दिया !!
१२. जब भगत सिंह अंतिम बार अपने
परिवार से मिलें थे, उस समय उन्हें यकीन
हो गया था कि ये उनकी अंतिम मुलाकात
है !! उन्होंने अपने मां से कहा, “बेबेजी,
दादाजी अब ज्यादा दिन तक
नहीं जियेंगे !! आप बंगा जाकर इनके पास
ही रहना !!” सबसे उन्होंने अलग-अलग बात
की !! सबको धैर्य बंधाया, सांत्वना दी !!
अंत में मां को पास बुलाकर हंसते-हंसते
मस्ती भरे स्वर में कहा, ‘‘लाश लेने आप मत
आना !! कुलबीर को भेज देना !! कहीं आप
रो पड़ी तो लोग कहेंगे कि भगत सिंह
की मां रो रही है !! इतना कहकर वे इतने
जोर से हंसे कि जेल अधिकारी उन्हें
फटी आंखों से देखते रह गए !!
१३. फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान
पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास
आया तब वो “राम प्रसाद बिस्मिल”
की जीवनी पढ रहे थे(कुछ
लोगों का मानना है कि वो लेनिन
की जीवनी पढ रहे थे) !! उन्होंने
बिना सिर उठाए हुए उससे
कहा 'ठहरो भाई, मैं राम प्रसात
बिस्मिल की जीवनी पढ़ रहा हूं !! एक
क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल
रहा है !! थोड़ा रुको !!' ऐसा इंसान जिसे
कुछ पलों के बाद फांसी होने वाली है उसके
बावजूद वो किताबें पढ़ रहा है, ये
कल्पना कर पाना भी बेहद मुश्किल है !!
१४. अंततः फांसी के निर्धारित समय से १
दिन पहले २३ मार्च १९३१ को शाम में
करीब ७ बजकर ३३ मिनट पर भगत सिंह
तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु
को फाँसी दे दी गई !! फाँसी पर जाते
समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे -
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे !!
मेरा रँग दे बसन्ती चोला !! माय रँग दे
बसन्ती चोला !!
Thursday, 27 June 2013
बनाएं इस साल को अपनी life का सबसे बड़ा साल >>>

लम्बी छलांग …
2012 बीत चुका है ….और अभी भी दुनिया ख़त्म नहीं हुई …so let’s welcome year 2013. 
Friends, मैं चाहता हूँ आपका ये साल आपकी life का सबसे बड़ा साल हो . And believe me मैं पूरी sincerity के साथ ऐसा चाहता हूँ , मैं जानता हूँ आप इस बात को समझते हैं कि मैं GROWTH देखना चाहता हूँ …आपकी भी और अपनी भी .
“बड़ा” का मतलब क्या है ?
Hmmm , पहला काम यही है आपको अपने लिए इस “बड़ा ” को define करना होगा . ये ऐसा कुछ होगा जो शायद आप बहुत पहले से पाना चाहते होंगे , जिसके बारे में सोचते होंगे , but unfortunately उसे पा नहीं पाते होंगे . आपके लिए बड़ा क्या है ये सिर्फ आप define करेंगे …हो सकता है ये औरों की नज़र में छोटा हो …that does not matter…ये बस आपके लिए बड़ा होना चाहिए …!!
For example:
किसी के लिए बड़ा हो सकता है ….अपना business start करना ….किसी के लिए English बोलना सीखना तो किसी के लिए exam में top करना . जो भी आपके लिए बड़ा है उसे अपने जेहन में बैठा लीजिये …अपनी success diary में लिख लीजिये , उसे अपना बना लीजिये ….क्योंकि अगर आप serious हैं तो ये साल आपके लिए अलग होने वाला है .
“बड़ा ” होने के लिए ज़रूरी नहीं है कि आप किसी end result तक पहुँच जाएं … “बड़ा ” तब भी है अगर आप उस रास्ते पर आगे बढ़ जाते हैं जो आपकी मंजिल तक जाता है .और ये test करने के लिए कि आप सही रास्ते पर हैं कि नहीं आपको हकीकत में हो रहे बदलावों पर ध्यान देना होगा .आपको ध्यान देना होगा कि क्या आपके efforts की बदौलत real world में कुछ ऐसा दिख रहा है जो prove कर सके कि आप सही दिशा में बढ़ रहे हैं .
मैंने 2010 के अंत में AKC की शुरुआत की थी और निश्चय किया था कि मैं इस blog से इतनी income generate कर लूँगा कि मुझे नौकरी करने की ज़रुरत न रहे ! यह मेरे लिए एक बड़ा काम था .
क्या मैं उसे 2011 में achieve कर पाया ?
नहीं .
2012 में ?
नहीं .
तो क्या मैं अपने लिए 2011-2012 को बेकार साल समझूँ ?
नहीं , on the contrary ये तो मेरी life के सबसे productive years थे …मैं इन दो सालों में अपने उस बड़े goal की तरफ बढ़ पाया , और वो काम करते हुए बढ़ पाया जो मुझे बेहद पसंद है —लोगों की मदद करना .
पर मैं इतना sure कैसे हूँ कि मैं सही रास्ते पर हूँ ?
क्योंकि मैं real world में ऐसी चीजें देख सकता हूँ जो ये prove करती हैं . AKC शुरू करने के सवा साल तक मैं इससे 1 रुपया भी नहीं earn कर पाया पर अब मैं इस blog से हर महीने 5 figure income generate करता हूँ . In my opinion मेरे लिए सबसे important time 2011 का ही time था …जब मैं अपनी self-belief और commitment के दम पर काम करते जा रहा था …बिना रुके ..बिना थके .
और अगर आप अभी तक अपने “बड़े काम” की तरफ नहीं बढें हैं तो आप भी अपनी thousands mile की journey एक step के साथ शुरू कीजिये …और जब बाद में आप पीछे मुड़ कर देखेंगे तो महसूस करेंगे कि 2013 आपकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा साल था – आपकी success story का पहला साल .
All the best !
Anjali jais..
IIT Indore
Anjali jais..
IIT Indore
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